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धमाकों से उठते सवाल

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बिहार की राजधानी पटना में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में बहुप्रचारित ‘हुंकार रैली’ के दौरान विगत २७ अक्टूबर २०१३ को पटना रेलवे स्टेशन और गांधी मैदान में सिलसिलेवार बम धमाके हुए, जिसमे आधिकारिक रूप से ५ व्यक्ति मारे गए और ९० के आसपास घायल हुए।
उस दिन १० लाख के करीब लोग रैली को लेकर पटना में जमा हुए थे, जिन्हे निशाना बनाकर आतंकी बहुत सारे उद्देश्य एक साथ साध सकते थे, किन्तु ऐसी किसी भी आशंका में मद्देनजर राज्य सरकार की तरफ से सुरक्षा में पूरी तरह से लापरवाही बरती गयी। यहाँ तक कि रैली के आयोजन स्थल पर ही लगातार धमाके होते रहे, एक आतंकी को भी भीड़ के लोगों ने ही भागते हुए पकड़ा।
इतना बड़ा आयोजन शहर में होने पर भी राजधानी की सुरक्षा के लिए राज्य सरकार कही से भी चिंतित नहीं थी वो भी तक जब १ अक्टूबर २०१३ और २३ अक्टूबर २०१३ को केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से राज्य सरकार को हिदायत जारी की गयी थी, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज किया गया और यह दावा किया जाता रहा कि कोई पूर्व सुचना नहीं थी और सुरक्षा में कोई चूक नहीं हुई है, जो कि सरासर झूठ है।
आगे मेरे कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब मैं बिहार सरकार से चाहता हूँ।
रक्सौल सीमा से कई आतंकी पकडे गए हैं, जिनमे इंडियन मुजाहिदीन का सरगना यासीन भटकल भी शामिल है, जिसके आतंक के दरभंगा मॉड्यूल को सभी सुरक्षा एजेंसियों ने देश के लिए बहुत बड़ा खतरा माना है। बोधगया में भी आतंकी हमले हुए, जिनमे धमाकों का इस्तेमाल किया गया, लेकिन फिर भी राज्य सरकार ने अपने एक भी पुलिसकर्मी को बम डिफ्यूज करने तक की ट्रैनिंग नहीं दी, कुछ दिनों पहले बेतिया न्यायलय परिसर में बम मिला था तो पुलिस उसे बाल्टी में पानी भरकर उसमे बम रख कर डिफ्यूज करने की कोशिश कर रही थी, और जब गांधी मैदान में जिन्दा बम मिला तो उसे आग जलाकर विस्फोट कराकर ही डिफ्यूज किया गया, जिसे लेकर एन आई ए ने यह भी कहा कि ऐसा करके बिहार पुलिस ने धमाकों के एक अहम् सुराग को नष्ट कर दिया
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के बिहार में आने के महीनों पहले से जिस तरह से सत्तारूढ़ दल द्वारा पुरे प्रदेश में उनके खिलाफ भय और नफरत का माहौल बनाने की पुरजोर कोशिश हुई थी, उसे भी इन हमलों के पीछे की प्रेरक शक्ति मानना अतिशयोक्ति नहीं होगा।
केंद्रीय जांच एजेंसी की मानें तो यह भी पता चला है कि आतंकी सरगना यासीन भटकल का सहयोगी तहसीन अख्तर समस्तीपुर के सत्तारूढ़ दल के एक बड़े नेता का नजदीकी रिश्तेदार है, और सनसनीखेज खबर यह आयी है कि सुरक्षा के राज्य सरकार के तमाम दावों के भीतर यह वांछित आतंकवादी गांधी मैदान में हुए धमाकों के दौरान घटना स्थल के आसपास ही मौजूद था और धमाकों के बाद पटना से बाहर भाग गया। यह लापरवाही नहीं तो और क्या है कि नाक के नीचे सब कुछ हो गया?
पटना में रविवार को सिलसिलेवार धमाके हुए, मंगलवार कोई भी पटना में तीन अन्य-अन्य जगहों पर जिन्दा बम बरामद होते रहे, लेकिन बजाये हमलों के दौरान अपनी सरकार की लापरवाही पर चिंतन करने और पूरी स्थिति को मॉनिटर करने के, मुख्यमंत्री मंगलवार को राजगीर में ‘चिंतन शिविर’ में रैली के दौरान भाषण में कही गयी बातों को लेकर मनोविनोद करते देखे गए। निश्चित तौर से मोदी की गलतियों का जिक्र कर शातिर मुस्कान मारते नितीश के चेहरों पर आतंकी हमलों का कोई भी दर्द नहीं दिख रहा था
यह तो कहिये कि इतनी बहुप्रतीक्षित रैली के दौरान जितनी भारी भीड़ जमा हुयी थी, उसमे अगर भगदड़ मची होती तो सैकड़ो लोग तो भगदड़ में ही मारे जाते। लेकिन जिस जज्बे और धैर्य के साथ उपस्थित अपार भीड़ और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने न तो भीड़ को विचलित होने दिया और न ही उग्र होने दिया, अन्यथा अगर अफरातफरी मचती तो निश्चित तौर पर यह और भी बुरा होता, ऐसा करके उपस्थित जनता ने आतंकियों के नापाक मंसूबों को मिटटी में मिला दिया
इतने भयपूर्ण माहौल में भी वहाँ उपस्थित बिहार की जनता ने जिस सूझबूझ के साथ उस कठिन वक़्त में भी समझदारी का परिचय दिया, वे नमन योग्य हैं, मुझे भी सही मायनों में इस बात को लेकर अपने बिहार से होने पर गर्व है। वहाँ उपस्थित जन-समूह ने यह साबित कर दिया कि वे सभी शान्ति चाहने वाले लोग हैं, उग्र और उन्मादी नहीं, जैसा भाजपा के विरोधी भाजपा और उसके समर्थकों को साबित करने पर तुले रहते हैं।



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
November 2, 2013

राहुल जी , नीति का भट्ठा बैठनेवाले नीतीश की शातिर मुस्कान की चर्चा मुझे तो बड़ा ही अर्थपूर्ण लगा ! बधाई !!


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