जबां हिलाओ

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जैसे को तैसा:लघु कथा

Posted On 26 Apr, 2012 मस्ती मालगाड़ी में

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एक राजा के पास एक नौकर था,यूँ तो राजा के पास बहुत सारे नौकर थे जिनका काम सिर्फ महल की देख-रेख और साफ़ सफाई करना था.
तो एक बार राजा का एक नौकर उनके शयन कक्ष की सफाई कर रहा था,सफाई करते करते उसने राजा के पलंग को छूकर देखा तो उसे बहुत ही मुलायम लगा,उसे थोड़ी इच्छा हुयी कि उस बिस्तर पर जरा लेट कर देखा जाए कि कैसा आनंद आता है,उसने कक्ष के चरों और देख कर इत्मीनान कर लिया कि कोई देख तो नहीं रहा.
जब वह आश्वस्त हो गया कि कोई उसे देख नहीं रहा है तो वह थोड़ी देर के लिए बिस्तर पर लेट गया.
वह नौकर काम कर के थका-हारा था,अब विडम्बना देखिये कि बेचारा जैसे ही बिस्तर पर लेटा,उसकी आँख लग गयी,और थोड़ी देर के लिए वह उसी बिस्तर पर सो गया..उसके सोये अभी मुश्किल से पांच मिनट बीते होंगे कि तभी कक्ष के सामने से गुजरते प्रहरी की निगाह उस सोये हुए नौकर पर पड़ी.
नौकर को राजा के बिस्तर पर सोते देख प्रहरी की त्यौरियां चढ़ गयी,उसने तुरंत अन्य प्रहरियों को आवाज लगायी.सोते हुए नौकर को लात मार कर जगाया और हथकड़ी लगाकर रस्सी से जकड लिया गया.
नौकर को पकड़ लेने के पश्चात उसे राजा के दरबार तक खींच के लाया गया.
राजा को सारी वस्तुस्थिति बताई गयी…उस नौकर की हिमाकत को सुनकर राजा की भवें तन गयी,यह घोर अपराध!! एक नौकर को यह भी परवाह न रही कि वह राजा के बिस्तर पर सो गया.
राजा ने फ़ौरन आदेश दिया ‘नौकर को उसकी करनी का फल मिलना ही चाहिए,तुरत इस नौकर को ५० कोड़े भरी सभा में लगाये जाएँ.’
नौकर को बीच सभा में खड़ा किया गया,और कोड़े लगने शुरू हो गए.
लेकिन हर कोड़ा लगने के बाद नौकर हँसने लगता था.जब १०-१२ कोड़े लग चुके थे,तब भी नौकर हँसता ही जा रहा था,राजा को यह देखकर अचरच हुआ.
राजा ने कहा ‘ठहरो!!’
सुनते ही कोड़े लगाने वाले रुक गए,और चुपचाप खड़े हो गए.
राजा ने नौकर से पूछा ‘यह बताओ कि कोड़े लगने पर तो तुम्हे दर्द होना चाहिए,लेकिन फिर भी तुम हंस क्यूँ रहे हो?’
नौकर ने कहा ‘हुजूर,मैं यूँ ही हंस नहीं रहा,दर्द तो मुझे खूब हो रहा है,लेकिन मैं यह सोचकर हँस रहा हूँ कि थोड़ी देर के लिए मैं आपके बिस्तर पर सो गया तो मुझे ५० कोड़े खाने पड़ रहे हैं,हुजूर तो रोज इस बिस्तर पर सोते हैं,तो उन्हें उपरवाले के दरबार में कितने कोड़े लगाये जायेंगे.’
इतना सुनना था कि राजा अनुत्तरित रह गए,उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने तुरत उस नौकर को आजाद करने का हुक्म दे दिया.

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

shashibhushan1959 के द्वारा
May 1, 2012

आदरणीय राहुल जी, सादर ! इस रचना पर मेरी दी हुई प्रतिक्रया दीख नहीं रही है ! बहुत सार्थक सन्देश देती रचना ! आज ऐसी कथाओं कि जरुरत है ! सुन्दर प्रयास !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    May 2, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी,सादर नमस्कार,हो सकता है आपकी प्रतिक्रिया अंतरजाल में उलझ गयी हो,किन्तु यह टिप्पणी जरूर दिख रही है.इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए साभार धन्यवाद. :)

चन्दन राय के द्वारा
April 29, 2012

राहुल साहब , आपने बड़ी शिक्षाप्रद कहानी से इक नैतिक मूल्यों की जरुरत का दीपक जलाया है , आपकी सुन्दर भावना का मर्म साफ़ झलकता है

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 29, 2012

    आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका साभार धन्यवाद.मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है :)

vikaskumar के द्वारा
April 29, 2012

एक सुन्दर लघुकथा जिसमें संदेश बहुत गहरा है ।

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 29, 2012

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है,प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद :)

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
April 28, 2012

अच्छी प्रस्तुति laghu-katha ke roop men | badhai rahul jee ! punashch !!

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 29, 2012

    आचार्य जी,सादर प्रणाम :)

Santosh Kumar के द्वारा
April 28, 2012

सुन्दर कहानी राहुल जी ,..जो जैसा करेगा वैसा भरेगा ,.समय से चेत जाएँ तो भला अन्यथा ऊपर वाले के दरबार में सब एक ही हैं क्या राजा क्या नौकर ..साभार

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    साभार धन्यवाद संतोष जी,आपने सत्य कहा कि उपरवाले के दरबार में सब बराबर हैं और सबको अपनी करनी का फल भोगना है :)

nishamittal के द्वारा
April 28, 2012

सुन्दर सन्देश देती कथा राहुल जी.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    साभार नमस्कार निशाजी,आपकी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद.

rekhafbd के द्वारा
April 28, 2012

राहुल जी ,कम शब्दों में ,सुंदर संदेश देती हुई यह कथा ,बधाई

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    साभार धन्यवाद रेखा जी,मेरे ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करता हूँ.

mparveen के द्वारा
April 28, 2012

बहुत सुंदर राहुल जी ….

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    साभार धन्यवाद परवीन जी :)

dineshaastik के द्वारा
April 28, 2012

राहुल जी नमस्कार, बहुत  ही सुन्दर संदेश  देती हुई प्रस्तुति…. बधाई….

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    साभार धन्यवाद दिनेश जी :)

vasudev tripathi के द्वारा
April 27, 2012

राहुल भाई, बड़ा जबरदस्त सन्देश है थोड़े शब्दों में!! कहानी की विधा की बात ही कुछ और है..!!

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    धन्यवाद वासुदेव भ्राता,यह लघु कथा मेरे पिताजी अक्सर सुनाया करते हैं,अतः मंच पर इसे प्रस्तुत करने से खुद को रोक नहीं पाया. :)

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 27, 2012

aadarnjya राहुल जी, सादर. सधी हुई, सन्देश deti katha. badhai.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    सादर धन्यवाद प्रदीप जी :)

alkargupta1 के द्वारा
April 27, 2012

राहुल जी , आज के समय के लिए बहुत बढ़िया कहानी…… नौकर ने राजा को अच्छा सबक दिया…..और नौकर मुक्त हो गया……

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    धन्यवाद अलका जी,और साथ ही राजा को जिंदगी की एक अनमोल सीख भी मिल गयी :)

ajaydubeydeoria के द्वारा
April 26, 2012

राहुल जी , बहुत सुन्दर कहानी लिखी है. पर आज ऐसा सोचता कौन है ? आज के परिदृश्य में आप जैसे लोगों की ही आवश्यकता है. तभी समाज में परिवर्तन आ सकता है. सुन्दर प्रस्तुति

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 28, 2012

    अजय जी,साभार नमस्ते,हमारे लेखन से थोडा भी परिवर्तन सार्थक दिशा में आ सके तो धन्य समझूंगा,प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया :)


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