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स्त्री,शूद्र और कलियुग की महत्ता

Posted On: 21 Mar, 2012 Others में

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एक बार कुछ मुनि मिलकर विचार करने लगे कि किस समय में थोड़ा सा पुण्य भी महान फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं?
….वे जब कोई निर्णय नहीं कर सके,तब निर्णय के लिए मुनि व्यास के पास पहुंचे.व्यासजी उस समय गंगाजी में स्नान कर रहे थे.मुनि मंडली उनकी प्रतीक्षा में गंगाजी के तट पर स्थित एक वृक्ष के पास बैठ गयी…….वृक्ष के पास बैठे मुनियों ने देखा कि व्यासजी गंगा में डुबकी लगाकर जल से ऊपर उठे और “शूद्रः साधुः“,”कलिः साधुः” पढ़कर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी…..जल से ऊपर उठकर ‘योषितः साधु धन्यास्ताभ्यो धन्यरो स्ति कः ‘ कहकर उन्होंने पुनः डुबकी लगायी….मुनिगण इसे सुनकर संदेह में पड़ गए.व्यासजी द्वारा कहे गए मन्त्र नदी स्नान-काल में पढ़े जानेवाले मंत्रो में से नहीं थे,वो जो कह रहे थे उसका अर्थ है ‘कलियुग प्रशंसनीय है,शूद्र साधु है,स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं,वे ही धन्य हैं,उनसे अधिक धन्य और कौन है!!!’
मुनिगण संदेह के समाधान हेतु आये थे,परन्तु यह सुनकर वे पहले से भी विकट संदेह में पड़ गए और जिज्ञासा से एक दुसरे को देखने लगे……कुछ देर बाद स्नान कर लेने पर नित्यकर्म से निवृत्त होकर व्यासजी जब आश्रम में आये,तब मुनिगण भी उनके समीप पहुंचे.वे सब जब यथायोग्य अभिवादन आदि के अनंतर आसनों पर बैठ गए तब व्यासजी ने उनसे आगमन का उद्देश्य पूछा.मुनियों ने कहा कि हमलोग आपसे एक संदेह का समाधान कराने आये थे,किन्तु इस समय उसे रहने दिया जाए,केवल हमें संभव हो तो यह बतलाया जाए कि आपने स्नान करते समय कई बार कहा था कि ‘कलियुग प्रशंसनीय है,शूद्र साधु है,स्त्रियाँ श्रेष्ठ हैं,वे ही धन्य हैं,सो बात क्या है? हमें कृपा करके बताएं.यह जान लेने के बाद हम जिस आतंरिक संदेह के समाधान के लिए आये थे,उसे कहेंगे.
व्यासजी उनकी बातें सुनकर बोले कि मैंने कलियुग,शूद्र और स्त्रियों को जो बार बार साधु,श्रेष्ठ कहा,आपलोग सुनें.जो फल सतयुग में दस वर्ष ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने से मिलता है,उसे मनुष्य त्रेता में एक वर्ष,द्वापर में एक मास और कलियुग में सिर्फ एक दिन में प्राप्त कर लेता है….जो फल सतयुग में ध्यान,त्रेता में यज्ञ और द्वापर में देवार्चन करने से प्राप्त होता है,वही कलियुग में सिर्फ इश्वर का नाम-कीर्तन करने से मिल जाता है.कलियुग में थोड़े से परिश्रम से ही लोगों को महान धर्म की प्राप्ति हो जाती है,इन कारणों से मैंने कलियुग को श्रेष्ठ कहा.
शूद्र को श्रेष्ठ बताने का कारण बताते हुए व्यासजी ने कहा कि द्विज(ब्रह्मण) को पहले ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और तब गृहस्थ् आश्रम में प्रवेश करने पर स्वधर्माचरण से उपार्जित धन के द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ-दानादि करने पड़ते हैं.इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप,व्यर्थ भोजन और व्यर्थ यज्ञ उनके पतन के कारण होते हैं,इसलिए उन्हें सदा संयमी होना आवश्यक होता है.सभी कार्यों में विधि का ध्यान रखना पड़ता है.विधि-विपरीत करने से दोष लगता है.द्विज भोजन और पान आदि भी अपने इच्छानुसार नहीं कर सकते.उन्हें सम्पूर्ण कार्यों में परतंत्रता ही रहती है.वे अत्यंत क्लेश से पुण्यलोकों को प्राप्त करते हैं,किन्तु जिसे केवल मन्त्रहीन पाक् यज्ञ का ही अधिकार है,वह शूद्र द्विज-सेवा से ही सद्गति प्राप्त कर लेता है,इसलिए वह द्विज की अपेक्षा धन्यतर है.शूद्र के लिए भक्ष्याभाक्ष्य अथवा पेयापेय का नियम द्विज-जैसा कड़ा नहीं है.इन कारणों से मैंने उसे श्रेष्ठ कहा.
स्त्रियों को श्रेष्ठ कहने का कारण बताते हुए व्यासजी ने कहा कि पुरुष जब धर्मानुकूल उपायों द्वारा प्राप्त धन से दान और यज्ञ करते हैं एवं अन्य कष्टसाध्य व्रतोपवासादि करते हैं,तब पुण्यलोक पाते हैं,किन्तु स्त्रियाँ तो तन-मन-वचन से पति की सेवा करने से ही उनकी हितकारिणी होकर पति के समान शुभलोकों को अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं जो कि पुरुष को अत्यंत परिश्रम से मिलते हैं,इसलिए मैंने उन्हें श्रेष्ठ कहा.
कलियुग,शूद्र एवं स्त्रियों को साधुवाद देने का रहस्य बतलाकर व्यासजी ने मुनियों से कहा कि अब आपलोग जिस लिए आये थे,वह कहिये.मैं आपसे अब सब बातें स्पष्ट रूप से कहूँगा.मुनियों को अपनी समस्याओं का समाधान मिल चुका था,इसलिए उन्होंने व्यासजी से कहा कि हमलोग भी आपसे पूछने आये थे कि किस समय में थोड़ा-सा पुण्य भी महान फल देता है और कौन इसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं? इनका उचित उत्तर आपने पहले ही दे दिया है,इसलिए अब हमें कुछ नहीं पूछना है.बिना पूछे ही अपने प्रश्नों का उत्तर पाकर मुनिगण आश्चर्य से विभोर हो गए.
व्यासजी के वचनों से अपनी शंकाओं का समाधान प्राप्त कर महाभाग मुनिगण व्यासजी का पूजन कर अपने-अपने स्थान को लौट गए.

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

follyofawiseman के द्वारा
April 13, 2012

अगर जिंदा रहना चाहते हैं तो मेरे इस ब्लॉग में दिए warning पे ध्यान दीजिएगा – http://pawansrivastava.jagranjunction.com/2012/04/13/%e0%a4%85%e0%a4%97%e0%a4%b0-%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a4%a4%e0%a5%87-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%a4%e0%a5%8b/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    April 14, 2012

    जी नमस्ते,रचना पढ़ी,अच्छी लगी,लेकिन अप्रासंगिक प्रतिक्रिया देखकर अजीब भी महसूस हो रहा है. क्या यह प्रतिक्रिया उपर्युक्त आलेख के सन्दर्भ में हैं?

Santosh Kumar के द्वारा
March 23, 2012

राहुल जी ,.नमस्कार बहुत सुन्दर लेख ,.कलियुग में बहुत जल्दी और सरलता से कृपा प्राप्त होती है ,..हम धन्य हैं !..बहुत आभार

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    नमस्ते संतोष जी,हम कलियुग में आ तो गए,ab इसका सदुपयोग भी अवश्य ही करना चाहिए,आपकी प्रतिक्रिया देख कर अच्छा लगा.

vinitashukla के द्वारा
March 23, 2012

एक प्रेरक तथा ज्ञानवर्धक आलेख. बधाई एवं साधुवाद.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    सादर धन्यवाद विनीता जी.

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 23, 2012

राहुल जी नमस्कार, ज्ञानवर्धक और विचार करने योग्य लेख. व्यास जी की के माध्यम से आप के द्वारा कही बातें अक्षरसहः सत्य हैं.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    नमस्ते अजय जी,प्रतिक्रिया हेतु आभार,यह बातें मैंने व्यासजी के माध्यम से नहीं कही,यह घटना विष्णुपुराण में वर्णित है,मैंने तो सिर्फ इसे सहज हिंदी में इस मंच पर रखने भर का काम किया है :)

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 22, 2012

राहुल जी , आप की तस्वीर देखकर ऐसा नहीं लगता कि इस तरुण उम्र में ही शास्त्रों और पुराणों का इतना गहन अध्ययन भी हो सकता है , पर ऐसा है | आश्चर्य !! यह लेख आलेख पढ़कर गोस्वामी जी की निम्न पंक्तियाँ बरबस ही स्मरण में कौंध जाती है — कलियुग केवल नाम अधारा , सुमरि-सुमरि नर उतरहिं पारा | बहुत- बहुत बधाई !!

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    सादर नमस्कार आचार्य जी,मेरी उम्र अभी इतनी नहीं हुयी कि प्रशंसा के इन अनमोल शब्दों को सहजता से ग्रहण कर लूं,आपकी टिप्पणी ने हौसला बढाया है,खाली वक़्त में कभी कभी धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन कर लेता हूँ,बस :) हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद. आप तो जानते ही होंगे कि विष्णुपुराण में इस प्रसंग का यथोचित वर्णन है.आपका आशीर्वाद बना रहे.

krishnashri के द्वारा
March 22, 2012

स्नेही राहुल जी , बहुत ही सुन्दर, ज्ञान वर्धक आख्यान ,समयानुकूल आपने सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया . धन्यवाद .

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    नमस्ते कृष्ण जी,आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से उत्साह बाधा है,धन्यवाद.

Tamanna के द्वारा
March 22, 2012

राहुल जी… कलियुग जैसे महान युग में जन्म लेना और वो भी नारी के रूप में.. !!! इसका अर्थ तो सबसे अधिक सौभाग्य तो हमें ही प्राप्त हुआ है… !!! http://tamanna.jagranjunction.com/2012/03/22/family-relationships-and-mutual-duties/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    हाँ,सच में आप बिलकुल सही जगह,सही समय पर और सही रूप में हैं.सुधि लेने के लिए धन्यवाद :)

nishamittal के द्वारा
March 22, 2012

चलिए हम धन्य हैं,कलियुग में जन्म लेकर और स्त्री हो कर

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    नमस्कार निशा जी,स्त्री होना सिर्फ कलियुग में ही नहीं सभी युगों में धन्य होने वाली बात ही है :)

dineshaastik के द्वारा
March 22, 2012

सच है सेवा करने वाला व्यक्ति ही श्रेष्ठ (ब्रह्मण) है और दुसरे से सेवा करवाने वाला शूद्र।

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    नमस्कार दिनेश जी,श्रेष्ठ बनने के लिए कठोर अनुशासन की आवश्यकता होती है,रोगी को ही सेवा की अनिवार्य आवश्यकता रहती है,अन्य के लिए यह शर्मनाक अवश्य है.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 21, 2012

सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई. महोदय जी.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    सादर धन्यवाद प्रदीप जी :)

vasudev tripathi के द्वारा
March 21, 2012

एक बहुत सुंदर आख्यान की प्रस्तुत के लिए साधुवाद राहुल भाई!!! वस्तुतः सेवा ही परम तप है और उस तप का अधिष्ठाता ही तपस्वी है, फिर वह चाहे किसी भी जाति वर्ण का क्यों न हो..!! निश्चित रूप से कलियुग में जीव सेवा ही एक मात्र साधन है.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    March 24, 2012

    आपने उत्तम आकलन किया बन्धु,सुधि लेने के लिए धन्यवाद. :)


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