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टीम इंडिया की दुर्गति

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पिछले साल की शुरुआत में भारतीय क्रिकेट टीम ने एकदिवसीय क्रिकेट का विश्व कप जीतकर करोड़ों खेलप्रेमियों को ख़ुशी का शानदार तोहफा दिया था,जो लम्बे समय तक यादगार रहेगा.विश्व कप जीतकर टीम इंडिया ने ख़ुशी का जो लम्हा हम खेलप्रेमियों को दिया,उसके लिए हम उनके अहसानमंद हैं,यह ख़ुशी ऐसी थी,मानो यह जीत हमारी व्यक्तिगत जीत थी.यहाँ तक की मैं विश्व कप फ़ाइनल मैच से पहले तक महेंद्र सिंह धोनी का गंभीर आलोचक था,किन्तु इस जीत ने हमारे मुँह पर ताला लगा दिया था,हमारा जमीर हमें इस व्यक्ति की आलोचना करने की इजाजत देने से साफ़ मना करने लगा.तकनीकी समस्या जो भी हो,धोनी भले ही भाग्य के धनी हो,किन्तु यह ख़ुशी उसी के जरिये हमें मिली,इसके लिए मैं धोनी का शुक्र गुजार हूँ.
किन्तु विश्व कप के बाद भारतीय टीम के दो विदेशी दौरों में टीम का प्रदर्शन इतना शर्मनाक रहा है,कि उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.सबसे पहले तो इंग्लैंड में जो बुरी गत हुयी उससे मजा किरकिरा हो गया…भारतीय टीम की इतनी शर्मनाक पराजय मैंने तो अब तक के अपने क्रिकेट-प्रेमी जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी…खैर उसी इंग्लैंड की थोड़ी कमजोर टीम को भारत बुलाकर एकदिवसीय मैचों में पटखनी देकर टीम इंडिया ने यह दिखाने की भरसक कोशिश की,कि अभी भी उनमे जीतने का हौसला और काबिलियत बरकरार है.
टीम को अब ऑस्ट्रेलिया दौरे की प्रतीक्षा थी,हमें भी उम्मीद थी की इस दौरे पर बेहतर प्रदर्शन करके टीम इंडिया यह साबित कर देगी कि अब वो विदेशी धरती पर उतने कमजोर नहीं हैं,जितना उन्हें समझा जाता है…किन्तु इस दौरे पर भी अभी तक हुए तीनो मैचों में भारतीय टीम ने शर्मनाक पराजय ही झेली है,और जले पर नमक ये कि कप्तान धोनी को धीमी ओवर गति के लिए चौथे मैच में खेलने से ही प्रतिबंधित कर दिया गया.

मैं कोई बहुत बड़ा क्रिकेट विश्लेषक नहीं हूँ,किन्तु अपने अल्प-ज्ञान में ही मैंने पहले हार के कारणों पर विवेचना करनी चाही,तो जो प्रमुख बिंदु समस्या के रूप में मेरे सामने उभर कर आये,उन्हें आप सब के साथ बांटना चाहूँगा.
इस दौरे पर सबसे बड़ी असफलता सलामी जोड़ी का नहीं चलना है,आम तौर पर यह सलामी बल्लेबाजों की जिम्मेदारी होती है की नयी गेंद का ज्यादा से ज्यादा सामना करें,जिससे मध्यक्रम के बल्लेबाजों को थोड़ी पुरानी गेंद खेलने को मिले और वे अपना नैसर्गिक खेल खेलकर टीम को मजबूती से आगे लेकर जाएँ,लेकिन इस दौरे पर दोनों सलामी बल्लेबाजों में से कोई एक बल्लेबाज १० ओवर के भी पहले आउट हो जाता है,जिसका नतीजा यह होता है कि ३ नंबर के बल्लेबाज को मजबूरी में एक सलामी बल्लेबाज की भूमिका निभाने को विवश होना पड़ता है,जबकि कोई भी बल्लेबाज अपनी नैसर्गिक भूमिका में ही टीम के लिए ज्यादा फायदेमंद होता है,और सलामी बल्लेबाजी इतना मुश्किल काम है कि आज तक सचिन ने भी खुद कभी टेस्ट में ऐसा जोखिम नहीं उठाया.खैर हमारे साथ समस्या है कि टेस्ट में राहुल द्रविड़ हमारे सबसे प्रमुख खिलाड़ी हैं,वह उच्च मध्यक्रम के एक महान बल्लेबाज हैं,किन्तु इस श्रृंखला में अब तक लगभग हर पारी में मजबूरन एक सलामी बल्लेबाज की भूमिका निभानी पड़ी है,और निश्चित रूप से कोई भी महारथी अपनी महारत के क्षेत्र के बाहर उतना प्रभावी नहीं रह पाता है,और मजबूत विपक्ष के सामने कमजोर पड़ जाता है.और जैसे ही विपक्षी उन्हें मात देते हैं,बाकी टीम ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है,यही कारण है की इस श्रृंखला में सचिन भी कई बार अच्छे रंग में दिखने के बावजूद भी कुछ कर पाने में असमर्थ रहे हैं.जब नींव ही कमजोर हो जाए तो फिर मकान को तो गिरना ही है,आप खम्भों से नींव का काम नहीं ले सकते,पर हाँ,अगर खम्भे अपनी जगह पर रहे तो जरुर गिरते मकान को बचा सकते हैं.
याद कीजिये २००३-०४ का भारत का ऑस्ट्रलियाई दौरा जिसमे भारत ने उन्हें मुहतोड़ जवाब दिया था,श्रृंखला की सुर्खियाँ भले ही द्रविड़,गांगुली,लक्ष्मण,सचिन,सहवाग,,कुंबले,अगरकर आदि लूट ले गए हों,किन्तु आकाश चोपड़ा ने एक सलामी बल्लेबाज के तौर पर जिस तरह लगातार नयी गेंद की धार को कुंद किया था,उसकी जितनी तारीफ़ की जाए,कम होगी,उसका फायदा उठाकर ही हमारे महारथियों ने स्टीव वॉ की बड़बोली टीम को चारों खाने चित्त किया था,किन्तु वर्त्तमान टीम की सलामी जोड़ी पिच पर वक़्त गुजारना नहीं चाहती,जिससे हमारे महारथी भी अपनी भूमिकाओं से बाहर आकर खेलने को विवश हैं और आशानुरूप प्रदर्शन करने में असफल हो रहे हैं,जिसका खामियाजा लगातार शर्मनाक हार के रूप में सामने आ रहा है.
……..होना यह भी चाहिए था कि अगर पहला विकेट जल्दी गिर जाता है तो विराट कोहली आदि को भी बल्लेबाजी क्रम में ऊपर भेजकर गेंद को पुरानी करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है,ऐसी स्थिति में जब द्रविड़,सचिन,लक्ष्मण आते तो उन्हें परिस्थितियों से सामंजस्य बिठाने की जद्दोजहद करने की जगह अपना नैसर्गिक खेल दिखाने का भी पूरा मौका मिलता,जो कि एक मजबूत चुनौती खड़ा करने के लिए बहुत ही ज्यादा जरुरी है.जब हम कमजोर हों और हमें विपक्षी का व्यूह भेदना है तो अपने महारथियों को उचित अवसर पर हमला करने हेतु उनका नैसर्गिक माहौल देने की पूरी कोशिश करनी ही होगी,जिससे विपक्षी को पराजित किया जा सके.
140148सचिन,द्रविड़,लक्ष्मण जैसे खिलाड़ी उम्र के आधार पर आलोचना का कारण बनें,यह तर्कसंगत नहीं लगता…पिछली कुछ श्रृंखलाओं पर नजर डालें तो यही दिखता है की आज भी टीम पूरी तरह से इन पर ही आश्रित है,वर्त्तमान में पिछली श्रृंखलाओं के आंकड़े उठाकर देख लीजिये,आप पायेंगे यही सत्य है,और ये खिलाड़ी ही हमारी सबसे बड़ी मजबूती हैं,इनको सही तरह से इस्तेमाल करने में कहीं कप्तान से चूक हुयी है,भले ही अपने प्रदर्शन के लिए ये व्यक्तिगत रूप से निश्चित तौर पर जिम्मेदार हैं,पर उस समय की परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.टेस्ट क्रिकेट सिर्फ रन और गेंद का मसला नहीं है.टेस्ट क्रिकेट ही क्रिकेट का असली स्वरुप है,जो भी टीम टेस्ट क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाती,उसे नीची नज़रों से देखा जाता है.
…..इन सब के बीच कप्तान धोनी,जो खुद भी पिछले दोनों विदेशी दौरों पर अच्छा प्रदर्शन कर पाने में असफल रहे हैं और उनकी कप्तानी में विदेशी धरती पर लगातार सात मैचों में टीम ने शर्मनाक पराजय झेली है,उन्होंने खुद भी टेस्ट क्रिकेट जल्द ही छोड़ने के सन्देश दिए हैं… धीमी ओवर गति के लिए उनपर श्रृंखला के चौथे टेस्ट में खेलने से प्रतिबंधित भी कर दिया गया है.
ऐसी स्थिति में निश्चित तौर पर वीरेंद्र सहवाग को ही अंतिम टेस्ट मैच में टीम की कमान संभालनी पड़ेगी,अब अगर विदेशी धरती पर लगातार सात टेस्ट मैच हारती आ रही टीम अच्छा प्रदर्शन कर सकने में सफल रहती है तो टेस्ट मैचों के लिए एक अलग कप्तान की नियुक्ति भी कोई बुरा विकल्प नहीं रहेगा.धोनी का एकदिवसीय क्रिकेट में बहुत अच्छा प्रदर्शन रहा है और उन्हें इस प्रारूप में टीम की कमान सँभालते रहना चाहिए.यह टीम के लिए अच्छा होगा.साथ ही नयी युवा प्रतिभाओं को प्रथम श्रेणी के विदेशी दौरों पर लगातार भेजकर उन्हें पर्याप्त अनुभव दिलाया जाए और चेतेश्वर पुजारा,शिखर धवन,रोहित शर्मा,रोबिन उथप्पा,अजिंक्य रहाणे,अभिनव मुकुंद जैसी प्रतिभाओं को प्रथम श्रेमी के मैचों में ज्यादा से ज्यादा विदेशी धरती पर खेलने का अनुभव दिलाया जाए,ताकि महारथियों की विदाई के पश्चात भी टीम की कमान सँभालने के लिए इन खिलाडियों के कंधे पर्याप्त रूप से मजबूत रहे.लेकिन अगर फिर से पिछली गलतियाँ दुहरायी गयी तो फिर हमारे बूढ़े शेरों में से किसी एक को वक़्त से पहले क्रिकेट को अलविदा कहना होगा,जो बहुत ही दुखद होगा,क्यूंकि ऐसे खिलाड़ी विलक्षण हैं,अभी इनमे बहुत क्रिकेट बची है और भारतीय क्रिकेट अभी भी समझदारी से इनकी प्रतिभा का इस्तेमाल कर बहुत कुछ पा सकता है.



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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lahar के द्वारा
January 23, 2012

प्रिय राहुल जी सप्रेम नमस्कार टीम india की हार का दुःख तो बहुत हुआ , लेकिन इस समय टीम को आलोचना की नहीं प्रोत्साहन की jarurat है | ये वही टीम है जिसने विश्व कप जीता था | अच्छा – बुरा वक्त सबके साथ आता है | उम्मीद है टीम इस बुरे वक्त से बहार निकलेगी और हमे अपनी विश्व विजेता टीम फिर से मिल जाएगी |

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 24, 2012

    नमस्कार,उम्मीद है आपने यह लेख पूरा पढ़ा हो,मैंने वही बातें लिखी हैं कि अभी टीम को सिरे से खारिज करने कि नहीं वरण सही नीतियों को अपनाने की जरुरत है…मैंने यह भी लिखा है की एकदिवसीय क्रिकेट में प्रदर्शन चिंताजनक नहीं है,किन्तु एकदिवसीय विश्व कप जीतने की ख़ुशी में हम टेस्ट क्रिकेट में अपनी प्रतिष्ठा इतनी आसानी से नहीं गँवा सकते.

sumandubey के द्वारा
January 22, 2012

राहुल जी नमस्कार , हार जीत तो खेल का अंग है पर खिलाड़ी जब बिग्यापन से इतना कम लेते है हारे या जीते पर जब इतनी शर्मनाक हार हो तो समीछा के साथ सजा भी होनी चाहिए .बाहर के रास्ता दिखाने का .

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 23, 2012

    सुमन जी,आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करता हूँ,जब खिलाड़ी आशा के अनुरूप नहीं खेल सकते तो निश्चय ही उनकी जगह उन खिलाड़ियों को मौका देना चाहिए जो उनकी जगह लेने में समर्थ हों.किन्तु ऐसे खिलाड़ियों को तैयार करने की जिम्मेदार बी सी सी आई की है,इसी के नाम पर तो वो इतने सारे पैसे कमाते हैं.

abodhbaalak के द्वारा
January 19, 2012

राहुल जी क्रिकेट में हार जीत तो होती ही रहती है, पर इस तरह का प्रदर्शन………….. इन लगातार हार की समीक्षा होनी चाहिए और इसका निवारण ….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 20, 2012

    निश्चित रूप से ऐसी हार शर्मनाक है,और इसपर गहन समीक्षा होनी ही चाहिए :)

dineshaastik के द्वारा
January 19, 2012

राहुल जी आपने किसी अच्छे क्रिकेट समीक्षक की तरह जो सटीक एवं तार्किक समीक्षा की है, वह निश्चित ही सराहनीय है। यह निर्विवाद रूप से सत्य ही कि हमारी हार के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण सलामी जोड़ी का असफल होना है। मेरे विचार से फास्ट पिचों पर सहवाग से ओपनिंग करवाना किसी भी दृष्टि से समझदारी नहीं हैं। शायद विराट इसके लिये उपयुक्त होता। चलो अगले मैच में देखते हैं क्या होता है। कृपया इसे भी पढ़े- आयुर्वेदिक दिनेश के दोहे भाग-2 http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 20, 2012

    प्रोत्साहन के लिए बहुत धन्यवाद,सलामी जोड़ी को पिच पर टिक कर खेलने की कोशिश करनी होगी…खैर देखिये अगले मैच में कप्तान बदलेगा,कही किस्मत भी बदल जाए,कुछ तो क्षतिपूर्ति हो,बेइज्जती की :)

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 18, 2012

आदरणीय राहुल जी. सादर अभिवादन. धूप छांव तो लगी रहती है पर सुसाइड कैसे बर्दाश्त किया जाए.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    जी नमस्कार,बर्दाश्त करना यकीनन बहुत मुश्किल है,बस देखते हैं कि भारतीय क्रिकेट यहाँ से किस दिशा में जा रहा है.

rajesh kotwal के द्वारा
January 18, 2012

बिलकुल सही आकलन है आपका …….

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    धन्यवाद राजेश जी :)

allrounder के द्वारा
January 18, 2012

नमस्कार राहुल भाई, इंडिया के इस निराशाजनक प्रदर्शन का तथ्यगत और सटीक आंकलन किया आपने उसके लिए धन्यबाद क्योंकि मैं भी क्रिकेट का बहुत बड़ा प्रशंशक हूँ और अभी तक मेरी समझ मैं नहीं आ रहा है की आखिर भारतीय टीम को हो क्या गया है ? हार जीत मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती मगर हार जीत के तरीके से मैं सचमुच विश्मित हूँ आखिर ढाई दिन के अंदर हम टेस्ट मैच हार गए वो भी तब जब विपक्षी टीम ने ३६९ रन ही बनाए थे, और ऐसा निरंतर हो रहा है, वजह चाहे कुछ भी हो एक क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मैं इस निराशा से उभर नहीं पा रहा हूँ !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    धन्यवाद सचिन जी,यह निश्चित रूप से तकलीफ देता है कि अकेले वार्नर ने १८० बनाये,जिसे पूरी भारतीय टीम दोनों पारियों में पार नहीं कर सकी और इतने कम स्कोर पर भी पारी के अंतर से हार गयी…यह गहन चिंता का विषय है…निराशा तो होती है,उम्मीद है जल्द ही सुधर जायेंगे वरना वेस्ट इंडीज की जो हालत हुयी है,वैसा हमारे साथ भी हो सकता है.

mparveen के द्वारा
January 18, 2012

राहुल जी आपने अच्छा विश्लेषण किया है क्रिकेट के बारे में . हमारी टीम में देखा जाये तो बल्लेबाज ज्यादा हैं और वो भी किसी भी अहम् मैच होने पर चोटिल हो जाते हैं . बालिंग की तरफ भी ध्यान देना चाहिए …. त्रिमूर्ति भले ही अब संन्यास लेने की उम्र में हो लेकिन उससे पहले अछे विकल्प भी तो होने चाहिए . जीत हार तो लगी ही रहती है खेलों में लेकिन इस तरह लगातार विदेशी दोरों पर हारकर लौटना भी शर्मनाक है . क्रिकेट पर हमारे राष्ट्रीय खेल से भी ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है …..

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    बिलकुल क्रिकेट पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है,मुख्य रूप से टी २० और एकदिवसीय क्रिकेट पैसे कमाने के मुख्य श्रोत हैं,यही कारण है की मूल स्वरुप टेस्ट में टीम की भद्द पिटती जा रही है,दोनों कमाऊ प्रारूपों में तो अभी टीम संतोषजनक खेल रही है,किन्तु टेस्ट की लगातार असफलता गंभीर चिंता का विषय है,नीतियों की पुनर्समीक्षा होनी ही चाहिए.

shashibhushan1959 के द्वारा
January 18, 2012

मान्यवर राहुल जी, सादर ! खेल में हार जीत तो होती है, पर शर्मनाक हार अच्छी नहीं लगती. युद्ध करके हारना और पलायन करना, दोनों दो बातें हैं.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    शशिभूषण जी नमस्कार,सही कह रहे हैं आप,हार जीत लगी रहती है,लेकिन लगातार हार ही लगी रहे तो दुःख होता है.और वो भी लड़कर हारते तो थोडा सहन हो सकता था,पर यह निश्चित रूप से शर्मनाक है.

manoranjanthakur के द्वारा
January 18, 2012

त्रिमूर्ति के बारे में और खासकर पूरा पोस्ट सही और काफी प्रभावी है इसपर अमल हो बधाई

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    धन्यवाद मनोरंजन जी :)

alkargupta1 के द्वारा
January 18, 2012

राहुल जी, क्रिकेट के प्रति आपके लगाव को देख कर बहुत अच्छा लगा….. इस विषय पर मैं कुछ टिप्पणी नहीं कर सकती हूँ लेकिन हाँ इतना तो अवश्य है कि जब अपनी टीम इंडिया हारती है तो बहुत दुःख होता है और जब जीतती है तो ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं…..और बस प्रार्थना करती हूँ कि जहाँ कहीं भी हमारी भारतीय टीम खेले उनका हौंसला बढे और विजयी हो और आकाश की बुलंदियों को छुए…….

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    धन्यवाद अलका जी,आपने लेख पर टिप्पणी कर हौसला बढाया,मेरी भी इच्छा है कि भारत हमेशा विजयी हो,यूँ हथियार डाल देना नागवार गुजरता है.

nishamittal के द्वारा
January 18, 2012

राहुल जी यद्यपि खेल में हार-जीत दो ही पहलु मुख्य होते हैं,टाई होना तो संयोग कहें कुछ और .परन्तु लड़कर हारना और आत्म समर्पण करना अर्थात गली मुहल्ले की टीम की तरह खेलना ,सभी प्रमुख खिलाडियों के साथ बहुत दुखद और लज्जाजनक है.मेरे विचार से लापरवाही और असीम धन मिलना भी इसके पीछे कुछ कारण हैं.पहले विदेशी कोच रखना और कांट्रेक्ट समाप्त होने या उस दौरान भी अपने देश के प्रति उनका झुकाव स्वाभाविक है,जिसमें हमारे खिलाडियों की कमजोरियां+ सकारात्मक पहलु भी साझा किये जाते हैं.अभी कुछ दिन पहले चैपल ने ये बात कही भी थी. शेष पॉइंट्स पर आपने संकेत किया ही है.चलिए ईश्वर हमारी टीम को(केवल क्रिकेट ही नहीं सभी खेलों में) बुलंदियों पर पहुंचाएं और देशवासियों की निराशा दूर हो.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    बिलकुल निशा जी,बराबरी की लड़ाई में हार होती है तो कोई गम नही होता किन्तु एकतरफा धुल जाना निराश करता है…किन्तु आगे विजयी होने के लिए नीतियों पर पुनर्विचार की आवश्यकता आ गयी है…आपने सुधि ली,आभार :)

Santosh Kumar के द्वारा
January 18, 2012

राहुल जी ,.आपका क्रिकेट प्रेम और ज्ञान दोनों सराहनीय हैं ,..मैं तो सिर्फ ख़बरों में ही सुनता रहता हूँ कि हार गए ,..फिर हार गए ,..फिरसे हार गए ,..मैं भी यह समझता हूँ कि बूढ़े शेरों को रिटायर करने से पहले उनका विकल्प तैयार करना चाहिए जो फिलहाल नहीं दिख रहा है ,..सुना है कि दादा कोच बनने के लिए तैयार हैं!! ,..यदि ऐसा होता है तो अच्छा ही होगा..

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 18, 2012

    बिलकुल संतोष जी…कोई विकल्प ना तैयार होने की दशा में मिटटी पलीत होनी तय है,किन्तु अंधाधुंध पैसे कमाने में जुटी बी सी सी आई जब तक ध्यान नही देती,कोई आशा करना बेमानी होगा. भारतीय खिलाडियों में भी कोच के लिए बहुत योग्य लोग हैं,उम्मीद है उन्हें भी आजमाया जाए.


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