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लोकपाल पास हो गया?

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सरकार ने अन्ना द्वारा तय समयसीमा के अन्दर लोकपाल को सदन में पेश कर दिया,लोकसभा में लोकपाल को पारित भी कर दिया गया.
तमाम राजनीतिक दलों की गंभीर आपत्तियों के बावजूद भी सत्तारूढ़ दल ने किसी प्रकार का तिकड़म लगाकर आखिर छद्म ‘लोकपाल’ को लोकसभा में पारित करा ही लिया,और इसे बेशर्मी के साथ अपनी उपलब्धि बताने में भी कोई कमी नहीं छोड़ेंगे,यह तय है.
आइये पूरे घटनाक्रम पर जरा एक नजर डालते हैं.
अब देखिये टीम अन्ना ने लोकपाल को लेकर आन्दोलन शुरू किया,सरकार से यह मांग की कि वर्षों से लंबित पड़े लोकपाल बिल को लागू कराया जाए…पहले तो सरकार आसानी से इसके लिए तैयार नहीं हुयी,लेकिन लगातार उजागर होते घोटालों और जन-आन्दोलनों के बढ़ते हुए दबाव को देखते हुए उसने बातचीत की पहल स्वीकारी और विभिन्न प्रकार के अड़ंगे लगाते हुए किसी न किसी तरह इस पूरे मामले को भरसक उलझाने की कोशिश की,इसी कोशिश का नतीजा है कि सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष की अवहेलना करते हुए सीधे ‘सिविल सोसाइटी’ के साथ कई बैठकें की,जो लगभग बेनतीजा ही साबित हुयी.लेकिन जब बात बनती न दिखी तो आन्दोलन के मुख्य सूत्रधारों को बदनाम करने का नीच खेल भी कांग्रेसी नेताओं ने भरसक खेला,रही-सही कसर टीम अन्ना के कुछ अति-गंभीर चिंतकों ने अपनी वैचारिक उल्टियों से खुद पूरी कर ली,इंडिया अगेंस्ट करप्शन संस्था जनवादी होते होते अतिवादी हो चली,आलोचना के चक्कर में उन्होंने किसी को नहीं बक्शा,भारतीय संसद को पश्चिमी शौचालय के रूप में प्रदर्शित करना कही से भी स्वीकारा नहीं जा सकता…जिसका कालांतर में ये फल मिला की टीम अन्ना ने बहुत हद तक जनता का भरोसा खो दिया,फलतः कांग्रेस को अपनी ये चाल सफल होते देख अपना खोया हुआ मनोबल वापस मिलने लगा..जिससे उसको और ज्यादा मनमानी करने की हिम्मत हुयी.एक तरफ कांग्रेस विपक्ष को परे धकेलकर उनके साथ मीटिंग भी कर रही थी और दूसरी तरफ उन्ही की तरफ से ‘सिविल सोसाइटी’ की वैधता पर लगातार उँगलियाँ भी उठाई जा रही थी.
खैर लोकपाल में कई सारे अड़ंगे लगाये गए,जैसे लोकपाल संवैधानिक संस्था होनी चाहिए,और उसमे अल्पसंख्यकों का आरक्षण होना चाहिए(जबकि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की बात नहीं करता),इसके लिए कांग्रेस संविधान संशोधन के लिए भी तैयार हो सकती थी,ऐसा प्रचारित किया गया.नतीजा यह हुआ कि लोगों का ध्यान लोकपाल के अधिकारों और संरूपण की बजाय अन्य बिन्दुओं पर केन्द्रित हो गया,जिसकी आड़ में लोकपाल को पंगु बनाने में कोई कसर न छोड़ी गयी.
लेकिन असली खेल तो लोकपाल के पेश होते समय होना था…अगर गौर से सोचें तो लोकसभा में हुयी बहस और बिल पर हुयी वोटिंग से आप बहुत कुछ अंदाजा लगा सकते हैं
जैसे कांग्रेस के अनुसार राहुल गाँधी का (बचपन से :D ) यह सपना है कि लोकपाल को संवैधानिक दर्जा मिले,किन्तु इसके लिए सदन में बहुमत हासिल करना अनिवार्य है.किन्तु शायद कांग्रेस की असली मंशा ऐसी नहीं थी,यही कारण था कि उनके अपने १६ सांसद भी व्हिप के बावजूद सदन से गायब रहे..लालू प्रसाद यादव तो खैर निजी कारणों से प्रभावी लोकपाल बिल के विरोध में शुरू से ही रहे हैं.सपा,बसपा और लेफ्ट के सांसद वाकआउट कर गए,किन्तु ये लोग सदन में रहकर बिल के खिलाफ वोटिंग भी कर सकते थे,किन्तु पता नहीं कुछ सेटिंग हुयी होगी.
उसके पहले सदन में दूसरे दलों ने बिल की खामियों का उल्लेख कर उन्हें सुधारने की मांग की तो ‘विकासवादी’ कपिल सिब्बल उल्टा आरोप लगाने लगे कि आप ही लोगों ने बिल को अब तक रोके रखा है,अतः विपक्ष की सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए खैर किसी तरह बिल पास हो गया,किन्तु बहुमत के अभाव में इसे संवैधानिक दर्जा नहीं मिल सकेगा,यह भी सुनिश्चित हो गया…अतः अब इसमें अल्पसंख्यक आरक्षण लागू करने में कोई तकनीकी विरोध भी नहीं रह जाएगा..हाँ,अगर यह बिल बहुमत से पारित हुआ होता तो अवश्य ही बिना संविधान संशोधन किये लोकपाल में अल्पसंख्यक आरक्षण नही हो पाता,संविधान संशोधन के लिए इस मुद्दे पर पर्याप्त बहुमत जुटा पाना बहुत ही मुश्किल है,इस स्थिति में कॉँग्रेस को तुष्टिकरण का कोई मौका नहीं मिलने वाला था…अतः वर्त्तमान स्वरुप में बिल को पास करा लेना कांग्रेस की एक बड़ी उपलब्धि मानी जानी चाहिए.लेकिन यह भी तय है कि इस प्रक्रम से सबसे ज्यादा फायदा कॉँग्रेस को ही होगा,जो लगातार सामने आते घोटालों की मार से असहाय सी एक कोने में पड़ी थी.
अब समस्या यह है कि अन्ना हजारे की मांग तकनीकी तौर पर पूरी हो चुकी है..इसके बावजूद भी अगर वो अपनी मांग जारी रखते हैं तो यह निश्चित रूप से सदन का विरोध माना जाएगा,क्यूंकि तकनीकी तौर पर संसद सिर्फ देश पर राज करने वाले लोगों का सम्मलेन स्थल नहीं वरण जनता के प्रतिनिधियों का सदन है,और चाहे बुरे हो या नीच और गिरे हुए,किन्तु जनता के लोकतांत्रिक प्रतिनिधि वो ही हैं जिनको संविधान सदनों में बैठने की अनुमति देता है.अन्ना हजारे जो नेता और जनता के बीच स्वामी-सेवक का सम्बन्ध बताते हैं,वह भी भ्रान्ति फैलाने वाला है, क्यूंकि यह स्पष्ट है कि जनता अपने प्रतिनिधि सदन में भेजती है,अपने सेवक नहीं..और संविधान में भी इन्हें जन-प्रतिनिधि ही कहा गया है,जनता का सेवक नहीं.हमारे जन-प्रतिनिधि बुरे हैं,यह हमारी अपनी कमजोरी है,,,अपनी गलतियों का खामियाजा तो भुगतना ही पड़ता है,हमारा मताधिकार किसी ने नहीं छीना है,हम उसका इस्तेमाल अपने विवेक से करेंगे,किन्तु अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर अपनी गलतियों के लिए लोकतंत्र और संसद जैसी संस्था को गरियाने से कुछ नहीं मिलेगा,अपनी गलतियों को सुधारने का मौका एक निश्चित अवधि के बाद मिलना भी तय है.
खैर आगे यह रस्साकसी कहाँ तक जायेगी,कहना अब भी मुश्किल है,किन्तु अब तक तो यही लग रहा है कि कांग्रेस ने इस सियासी चाल में टीम अन्ना को चित्त कर दिया है…टीम अन्ना के समर्थक कुछ उदास तो उनके आलोचक कुछ खुश लग रहे हैं…लेकिन मैं सोचता हूँ कि इस मामले में ख़ुशी मनाने का अधिकार सिर्फ कांग्रेसियों का बनता है,क्यूंकि कांग्रेस ने ‘थूथुन पर लाठी रोकने’ के बाद सिर्फ अन्ना को ही नहीं बल्कि पूरे देश को ही घंटा दिखा दिया है.क्या घंटा थामकर भी कोई ख़ुशी मना सकता है?



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Abdul Rashid के द्वारा
January 4, 2012

राहुल जी ठगों का जाल था आम जनता भोली थी उम्मीद लगा बैठी कसूर किसका बहुत अच्छा लगा पढ़कर सप्रेम अब्दुल रशीद http://www.aawaz-e-hind.in

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 5, 2012

    आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया उत्साहवर्धक है रशीद भाई,धन्यवाद. :)

dineshaastik के द्वारा
January 4, 2012

सही कहा आपने कांग्रेस ने देश  को  घंटा  पकड़ा  दिया है, अब देशवासियों का फर्ज बनता है कि वह कांग्रेस को घंटा पकड़ा दें। नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…….

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 4, 2012

    सधन्यवाद नव वर्ष की शुभकामनाएं आपको भी :) अब जनता इस घंटे से उनका सर फोड़ती है,या इस घंटे को पिघलाकर कटोरा बना उन्हें थमाती है,देखने की बात होगी.

shashibhushan1959 के द्वारा
January 1, 2012

मान्यवर राहुल जी, सादर ! भले ही “कांग्रेस ने ‘थूथुन पर लाठी रोकने’ में कामयाबी पायी है, परन्तु भेनास तो फूट ही गया है. माथा भी भन्ना गया होगा, और दिमाग भी चकरा गया होगा ! यह जनता की हार नहीं है बल्कि युद्धनीति पर पुनर्विचार का समय है. परिणाम आशाजनक ही होगा !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 1, 2012

    नव वर्ष की शुभकामनाएं :) निश्चित रूप से यह जनता की हार नहीं है,किन्तु नीतिगत कमियों की वजह से टीम अन्ना बैकफुट पर है…..जनता की हार कभी नहीं हो सकती.

manoranjanthakur के द्वारा
December 29, 2011

sahi मुद्दों को संजोजित करती puri परताल के साथ बेहतर सोच

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 2, 2012

    नव वर्ष की शुभकामनाएं :)

Santosh Kumar के द्वारा
December 29, 2011

राहुल जी ,.सादर नमस्कार  लिखने के लिए कुछ बचा नहीं है ,…कांग्रेस ने देश को घंटा ही पकडाया है ,..कंग्रेसिओं को खुशी मनाने का अवसर है ………………मैं मानता हूँ कि , हमारे लिए यह रोने का वक्त नहीं है ,…वो जीते जरूर हैं लेकिन देश हार नहीं सकता ,….सटीक लेख के लिए आपका हार्दिक आभार

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 2, 2012

    संतोष जी,नव वर्ष की शुभकामनाएं :) देश कैसे हारेगा बंधू…वो जीते भी नहीं हैं,बल्कि सिर्फ टीम अन्ना की नीतिगत कमियों पर उन्हें औंधे मुह किया है…एक बाजी उनके नाम रही,अब देश को सतर्क रहना चाहिए इन मोटी चमड़ी वाले दरिंदों से.

raj के द्वारा
December 28, 2011

लोकतंत्र खुद गुंडागर्दी भ्रष्टाचार व्यभ्चार की गिरफ्त में है वहां वोट के सहारे कुछ होना होता तो पिछले साठ सालों में हुआ होता है पूजा की बातें मंदिरों करना उचित है कोठों पर नहीं एक एक वोट के लिए पांच साल तक बिना किसी बहस इंतजार हमारे चुने प्रतिनिधिओं को हुक्मरान और हम पर साशन करने वाला बनता है अच्छा और संतुलित व नैतिक लेख बधाई

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 2, 2012

    धन्यवाद बन्धु,नव वर्ष की शुभकामनाएं :)


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