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आन्दोलन से उपजे कुछ सवाल

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पिछले कई सारे दिनों से भ्रष्टाचार से त्रस्त हमारे देश की जनता उबकर सड़कों पर आ गयी…स्वामी रामदेव जी का आन्दोलन हो या अन्ना हजारे जी का..दोनों आन्दोलनों से जुडी लगभग हर बातें सभी लोग जानते हैं,इसीलिए मैं इन आन्दोलनों या इनके मकसदों पर अपनी तरफ से कुछ नहीं जोडूंगा.किन्तु विगत कुछ दिनों में संसद और उसके बाहर हुई कुछ गतिविधियों से मेरे मन में कई प्रकार के प्रश्न उठ रहे हैं,जिन्हें मैं इस मंच के माध्यम से आप सब के सामने रखना चाहता हूँ…
सबसे पहले मैंने सुना कि कुछ लोग कह रहे थे कि आन्दोलन का समर्थन कर रहे लोगों में से अधिकतर को यह भी नहीं पता कि लोकपाल के ड्राफ्ट में क्या है.मैंने भी खबर पढ़ी तो मुझे भी लगा कि मैंने भी तो नहीं पढ़ा है,सो मैंने सबसे पहले इंडिया अगेंस्ट करप्शन के जन-लोकपाल ड्राफ्ट के बारे में जानकारी हासिल की,और मैं यह देखकर हैरत में पड़ गया कि आखिर गैर-सरकारी संगठन(एन जी ओ) लोकपाल के दायरे से बाहर क्यूँ रहेंगे?जबकि यह जानी-समझी बात है कि गैर-सरकारी संगठन भी भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने में पीछे नहीं रहते हैं.यह सच है कि लोकपाल का जो सरकारी ड्राफ्ट तैयार किया गया वो पूरी तरफ से दन्त विहीन कुत्ते के सामान है,किन्तु सामजिक संगठन इंडिया अगेंस्ट करप्शन द्वारा तैयार लोकपाल का ड्राफ्ट भी पूरी तरह से भ्रष्टाचार का खात्मा कर पाने में असमर्थ है,क्यूंकि यह खुद गैर सरकारी संगठनों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की वकालत करता है.
अगर सरकार इस आन्दोलन को संविधान या लोकतंत्र के लिए एक खतरा मानती है तो उसके लिए पुरे तौर पर खुद सरकार ही जिम्मेदार है,पहले तो खुद जम के भ्रष्टाचार करेगी और भ्रष्टाचारियों का हरसंभव बचाव करेगी,फिर जब कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होगा तो उसके मौलिक अधिकारों पर भी हमला करेगी.अन्ना हजारे के साथ यही हुआ,तमाम जनमानस उनके साथ तब जुड़ा जब सरकार ने शांतिपूर्ण विरोध के उनके अधिकार का बेशर्मी से दमन करने की चेष्टा की,वो जनता जो लगातार होते घोटाले और सरकारी निष्क्रियता से उब चुकी थी,अब और हठधर्मिता बर्दाश्त करने की हालत में नहीं थी,और जनता खुलकर सड़कों पर आ गयी.
आन्दोलन का फायदा यह हुआ कि लोगों ने एक बार फिर खुलकर ‘वन्दे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ जैसे नारे लगाये,जिसपर बुखारी जैसे दोगले इंसानों का चोला एक बार फिर सबके सामने उतर गया,किन्तु इसी आन्दोलन के प्रथम चरण में शायद अग्निवेश की तरफ से भारत माता के चित्र पर आपत्ति दर्ज करायी गयी थी तो अगले दिन से टीम अन्ना ने भारत माता का चित्र अप्रैल में जंतर-मंतर के अपने मंच से हटा दिया था,वही टीम अन्ना बुखारी के वक्तव्य देने के तुरंत बाद उनके पास अपना पक्ष रखने चली गयी(?).और वही स्वामी अग्निवेश,जिन्हें भारत माता के चित्र से भी समस्या थी,अब जाकर सरकारी दलाल पाए गए हैं.
सरकार जो संसद की सर्वोच्चता की दलील देती है,उसने लोकपाल के ड्राफ्ट बनाने के लिए सिविल सोसाइटी के साथ विपक्ष की सहभागिता की परवाह किये बगैर कई सारी मीटिंग की,आज जब अपने बनाये जाल में उलझ गयी है तो तमाम तरह से जाल बुनकर संसद और संविधान का वास्ता देती है ….जबकि लोकपाल बिल पर बहस बहस के दौरान ही कांग्रेस के सांसद राहुल गाँधी संसद की घोर अवमानना करते हैं और संसद चुपचाप उन्हें मौन स्वीकृति देती है.उन्हें लोकसभा पर प्रश्न-काल में लोकसभाध्यक्ष के विशेषाधिकार के तहत सवाल रखने की इजाजत दी,लेकिन उन्होंने पहला तो पंद्रह मिनट तक भाषण दिया और उसमे भी कोई सवाल भी नहीं पूछा और लोकसभाध्यक्ष ने उन्हें रोका भी नहीं.जबकि प्रश्नकाल के दौरान लोकसभाधय्क्ष के विशेषाधिकार से भी कोई व्यक्ति तीन मिनट तक ही बोल सकता है.
अन्ना हजारे जी गांधीवादी हैं,किन्तु उन्ही के मंच से ओमपुरी जी लोगों को यह सलाह देते हैं कि यदि नेता दारु दे तो उसे ले के पौकेट में रखो और घर जाओ …क्या इस वक्तव्य की निंदा नहीं होनी चाहिए?गांधीजी के क़दमों पर चलनेवाले को इस कथन की निंदा अवश्य करनी चाहिए थी,लेकिन विरोध के माहौल में किसी ने इस की भर्त्सना तक नहीं की.
कई लोग यह सवाल भी उठाते रहे हैं कि आखिर सिविल सोसाइटी के लोगों का चुनाव किस प्रकार से हुआ है,और सच पूछें तो इसका जवाब मुझे भी आज तक नहीं पता कि आखिर इनका चुनाव किस प्रकार हुआ था.खैर जब स्वामी रामदेव ने सिविल सोसाइटी से एक प्रश्न किया कि जब कानून विदों को सिविल सोसाइटी में रखना है तो शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण दोनों को रखना उचित नहीं होगा तो बिना कोई तार्किक जवाब देने के लोग उन पर टूट पड़े और जवाब यही मिला कि खुद उन्हें शामिल नहीं किया है,इसीलिए वो सवाल उठा रहे हैं,लेकिन क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि आखिर यही बाप-बेटे ही इस देश के सबसे इमानदार वकील हैं?जबकि लोग आरोप लगाते हैं कि शांति भूषण ने अफज़ल की फांसी के विरूद्ध केस लड़ा है,मुलायम सिंह की आय से ज्यादा संपत्ति मामले का केस लड़ने के एवज में मुलायम ने इन्हें एक शानदार गेस्ट हाउस भी गिफ्ट किया है,और ताजा खबर आई है कि ‘जज को मैनेज करने’ को लेकर मुलायम सिंह से हुई बात की इन पिता-पुत्रों की सी डी सही पायी गयी है.
हमारे सांसद संसद की सर्वोच्चता की बात करते हैं किन्तु शर्म आनी चाहिए उन्हें कि इस संसद में ऐसे भी नेता बैठते हैं,जिनका सामान्य ज्ञान इतना कमजोर है कि इन्हें देश की पहली महिला आई पी एस अधिकारी का नाम भी नहीं पता,जिस तरह संसद में अपनी सीट से उठकर शरद यादव और लालू प्रसाद यादव भांड की तरह ड्रामेबाजी कर रहे थे,और पहेलियाँ बुझा रहे थे कि कौन है वो महिला,जो पुलिस में काम करती थी,बाल कटाती है,जींस पहनती है…देश की पहली महिला आई पी एस अधिकारी की चर्चा जिस ड्रामेबाजी के साथ संसद में इन दोनों सांसदों ने की,उससे मैं स्तब्ध हूँ.
वैसे इसी आन्दोलन के दौरान मुझे यह भी पता चला कि इंडिया गेट पर जहां ‘अमर जवान ज्योति’ जलती है,वहाँ मौजूद शिला-पट्ट पर आजाद भारत की तरफ से शहीद हुए किसी सैनिक का नाम नहीं खुदा है,बल्कि वहाँ उन सैनिकों के नाम अंकित हैं जिन्होंने ब्रिटिश-भारत की तरफ से लड़ते हुए अपने प्राण गंवाएं,यह तथ्य मुझे कुछ अजीब सा लगा लेकिन जो है सो है.
यह तय है कि जब तक सरकारी मशीनरी के साथ ही गैर सरकारी संगठनों एवं प्राइवेट सेक्टर पर लगाम नहीं लगेगी,भ्रष्टाचार मिटाना कभी संभव नहीं होगा.यह जरुर है कि लोकपाल आने के बाद सरकारी लूट पर बहुत हद तक प्रतिबन्ध लगेगा.किन्तु यह लोकपाल भ्रष्टाचार पर पूरी तरह रोक लगा सकेगा,यह संभव नहीं लगता.
खैर जब संसद ने ‘टीम अन्ना’ की सुझाई तीन मांगो को स्वीकार कर संसद में पारित किया और अन्ना ने अनशन तोड़ा तब टीम अन्ना की तरफ से कांग्रेस पार्टी,और प्रधानमंत्री को धन्यवाद प्रेषित किया गया,किन्तु जिस आन्दोलन को ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ कहकर प्रचारित किया गया,उस लड़ाई के पहले शहीद भाई अरुण दास(३२ वर्ष,उड़ीसा..अनशन के ९वे दिन इनकी शहादत हो गयी)…का जिक्र तक टीम अन्ना ने नहीं किया,यह बात मुझे बहुत ही ज्यादा कचोट रही है.मुझे टीम अन्ना से ऐसे बर्ताव की अपेक्षा नहीं थी.
खैर,मैं जब ये सोचता हूँ कि अगर सच में भ्रष्टाचार पूरी तरह से हमारे देश से गायब हो गया तो क्या होगा…सबसे पहले तो लाखों लोग जो लगभग सभी शहरों में रेलवे स्टेशन,बस स्टैंड,सड़कों के किनारे किसी तरह कुछ रुपयों का इंतजाम कर पेट पालने का कोई भी छोटा सा कारोबार करते हैं,सब्जियां बेचते हैं,ठेलों पर अपनी दुकान चलाते हैं और किसी तरह अपना गुजारा चला पाते हैं,वो सभी बेरोजगार हो जायेंगे…भ्रष्टाचार मिटने से जो बेरोजगारी फैलेगी उसकी भरपाई करने के लिए हमें तमाम बेरोजगार हुए लोगों को रोजगार मुहैया कराना ही होगा,अन्यथा कई सारे लोग अचानक भूखे मरने के कगार पर पहुँच जायेंगे.लेकिन हमारे खजाने में इतना धन नहीं है कि एक झटके में सबको एक साथ रोजगार मुहैया कराया जा सके,इसके लिए जरुरी है कि देश से लूट कर विदेश में जो काला धन जमा किया गया है,उसे वापस लाया जाए,ताकि राष्ट्रीय कोष समृद्ध हो,जब राष्ट्रीय कोष समृद्ध होगा तभी हम नए रोजगार का सृजन कर सकेंगे.अकेले लोकपाल विदेश से काला धन वापस मंगा सकने में असक्षम है.अतः मुझे कहीं न कहीं ये लगता है कि काला धन वापस लाये बिना अगर किसी भी तिकड़म से भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लग भी गयी तो यह परिस्थिति बहुत ही विस्फोटक होगी.
हमारे आन्दोलन का उद्देश्य तभी सार्थक सिद्ध होगा जब हम सार्थक,सक्षम लोकपाल की बहाली के साथ साथ काले धन को वापस लाने की मांग भी उसी एकजुटता के साथ करें जो हमने अन्ना हजारे के व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हनन होने के बाद दिखाई थी.वरना लोकपाल शायद भ्रष्टाचार तो मिटा देगा,किन्तु समाज का नए सिरे से सृजन करना सर्वथा असंभव हो जाएगा.

अगर संसद को यह लगता है कि लोकपाल के आने से लोकतंत्र पर खतरा पैदा होगा तो संसद खुद आगे बढ़कर पहल करे,काला धन जो विदेशों में जमा है,या देश में ही कही छिपा कर रखा गया है उसे वापस देश की मुख्यधारा में लगाये,भ्रष्टाचार पर लगाम लगाये एवं बड़े घरानों को फायदा पहुचने की सामंती सोच के दायरे से बाहर निकले,हमें लोकपाल या कोई जादू की छड़ी नहीं,सिर्फ भ्रष्टाचार मुक्त लोकतंत्र चाहिए जहां सबको प्रगति के सामान अवसर मुहैया कराये जाएँ.संसद अपनी कमियां लोकतंत्र और संविधान की आड़ लेकर नहीं छुपा सकती
…यह बात पूरी तरह सच है कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार संसद के ही पास है,किन्तु यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि संसद लगातार भ्रष्टाचार रोकने में असफल रही है,यही कारण है कि अब जनता सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने में हिचकती नहीं है.अगर इस बार भी संसद जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहती है तो परिणाम लोकतंत्र के लिए हानिकारक भी हो सकता है.अब भी सब कुछ संसद के हाथ में है…और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद इस मामले पर कैसा रास्ता अपनाती है.



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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

surendra के द्वारा
September 22, 2011

मीडिया की बैशाखी पर टिके अन्ना के आन्दोलन से मुझे तो कोई उम्मीद नहीं लगती, शायद लोग भूल गए की अन्ना किस मांग को लेकर अनसन पर बैठे थे और फिर आखिर ऐसा क्या मिल गया जो मीडिया ने उन्हें विजयी घोषित कर दिया……समझौतों के साथ खत्म हुआ आन्दोलन, और जनता के हाथ फिर कुछ नहीं लगा……. वैसे भी अन्ना के समर्थन में आन्दोलन कारी ज्यादातर लोग बाबा के ही कार्यकर्ता थे, बाकि की भीड़ में ज्यादातर लोग मेला देखने आये थे, उसी जगह अगर बाबा का आन्दोलन १२ दिन चलता तो शायद पूरी दिल्ली जाम हो जाती, इसीलए आनन् फानन में सरकार ने रात को आन्दोलन को कुचला…. बाबा का आन्दोलन बहुत बहुत बड़ा है, संपूर्ण क्रांति और संपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन जिसमे भारत की सभी समस्याएं जैसे- कृषि व्यवस्था, शिक्षा व्यवथा, चिकित्सा व्यवथा, कानून एवं न्याय व्यवस्था, अर्थ व्यवस्थाओ का स्वदेशी-करण, भय भूख आभाव से मुक्त समाज की इस्थापना, आदर्श ग्राम योजना, और भी कए अत्यंत गंभीर मुद्दे और भविष्य की दूरगामी योजनाओ को लेकर बाबा आगे बढ़ रहे है….. जब आन्दोलन बड़ा है तो समय भी थोडा ज्यादा ही लगेगा……. बाबा रामदेव का आन्दोलन और सदी के महानायक स्वर्गीय राजीव भाई का सपना एक दिन जरूर पूरा होगा………. इश्वर उनके आन्दोलन को सफल बनेये और इन मीडिया वालो को सदबुध्धि दे…. जय हिंद…जिया भारत…

surendra shukl bhramar5 के द्वारा
September 4, 2011

प्रिय राहुल जी सुन्दर आलेख …सवाल तो उभरते ही रहेंगे लेकिन जबाब जो होना चाहिए वही हो आइये इसके लिए कुछ करते बढे चलें —बाबा जी फिर से २० तारिख से झाँसी चल रहे हैं आइये देखें …अब जनता सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने में हिचकती नहीं है.अगर इस बार भी संसद जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहती है तो परिणाम लोकतंत्र के लिए हानिकारक भी हो सकता है. भ्रमर ५

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 6, 2011

    बिलकुल सुरेन्द्र जी,स्वामी रामदेव के आन्दोलन का मैं भी समर्थन करता हूँ,आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

Alka Gupta के द्वारा
September 3, 2011

राहुल जी , आपकी सशक्त लेखनी द्वारा तथ्यपरक आलेख की रचना निस्संदेह विचारणीय है अति उत्तम लेख !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 6, 2011

    नमस्कार अलका जी,उत्साहवर्धक टिप्पणी देकर समर्थन जताने के लिए आपका धन्यवाद.

vasudev tripathi के द्वारा
September 2, 2011

बड़े भाई शायद एक अंतराल के बाद आपने यहाँ अपनी लेखनी उठाई किन्तु एक नितांत आवश्यक बिषय पर| बहुत कुछ है जो जनता से छुपा रह गया अतः राष्ट्रवाद की भावना के साथ इन प्रश्नों को उठाने के लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं| मैंने इस विषय पर गंभीर चिंतन व यथा-सामर्थ्य अध्ययन के बाद बहुत कुछ निष्कर्ष में पाया किन्तु समयाभाव के चलते प्रस्तुत नहीं कर सका आपके इस लेख मेरी इच्छा की काफी पूर्ति हो गयी है अतः पुनश्च आपका धन्यवाद|

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 3, 2011

    धन्यवाद भ्राता,बहुत हद तक हमारी सोच एक दुसरे से मिलती है :) मैं भी बहुत दिनों से बहुत कुछ सोच सोचकर परेशां था,बहुत सी बातें ऐसी भी हैं,जिन्हें मैंने इस लेख में नहीं उठाया है,उचित वक़्त का इंतज़ार कर रहा हूँ बस.वक़्त निकाल कर आपने प्रतिक्रिया दी,मुझे बहुत अच्छा लगा,आपका साभार धन्यवाद.

manoranjanthakur के द्वारा
September 2, 2011

श्री राहुल जी बहुत सुंदर ,आभार धन्यवाद

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 3, 2011

    आपकी टिप्पणी समेत आपका स्वागत है मनोरंजन जी,धन्यवाद.

surendra के द्वारा
September 2, 2011

मीडिया और देश के लोगो को अन्ना में लगाकर सोनिया मैडम ने चुपके से अपना काला धन ठिकाने भी लगा दिया….जन लोकपाल तो बनेगा नहीं किन्तु बाबा रामदेव का अति खतरनाक आन्दोलन भी दब जायेगा…!!!

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 3, 2011

    सुरेन्द्र जी,यही वो प्रश्न है जो सबसे भयानक परिणाम ला सकता है,और मुख्य रूप से इसी बात का डर भी है,आपने दिल की बात कह दी,मैं आपके इस वक्तव्य का स्वागत करता हूँ,यह प्रश्न हमारे मन में भी बहुत दिनों से कौंध रहा है…आपकी साहसिक सार्थक प्रतिक्रिया के लिए कोटि कोटि धन्यवाद सुरेन्द्र जी.

neelamsingh के द्वारा
September 2, 2011

राहुल जी उत्कृष्ट और यथार्थ से परिपूर्ण लेख , बधाई हो ! दुष्यंत के शब्दों में – मत कहो आकाश में कुहरा घना है , यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है , पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं , बात इतनी है कि कोई पुल बना है |

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 2, 2011

    बहुत धन्यवाद नीलम जी :)

abodhbaalak के द्वारा
September 2, 2011

भ्राता राहुल, प्रन्श्नीय और सराहनीय लेख, आपके उठाये गए सरे ही प्रश्न और उत्तर सच में बड़े ही महत्त्व रखते हैं, सच पूछें तो जिन बातों पर आपने रौशनी डाली है उनपर कम ही लोग होंगे जो ….. आपसे सदा प्रासंगिक ….. ऐसे ही इस मंच की शोबह बढ़ाते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 2, 2011

    आपकी सदाशयता है बंधू,टिप्पणी के लिए धन्यवाद. :)

jlsingh के द्वारा
September 1, 2011

राहुल जी, नमस्कार, आपके पोस्ट में सवाल और जवाब दोनों शामिल हैं ऐसा मुझे लगता है. हर सिक्के के दो पहलू होते है. पर, एक आदमी सारे काम नहीं कर सकता! हम सबकी जिम्मेवारी है– और जरूरत है जागरूकता और एकजुटता की जो टीम अन्ना ने कर दिखाया! अगर अन्ना जैसे सीधे सादे व्यक्तित्व वाले के साथ मिलकर कुछ लोग जिन्हें आज सिविल सोसाइटी के नाम से जाना जाता है इतना बड़ा आन्दोलन को अमली जामा पहनाकर आधी जीत के साथ संतुष्ट हो जाते हैं तो अवश्य ही हमें बहुत काम करना बाकी है. आपके प्रश्न और सुझाव स्वागत योग्य है जिसपर हम सबको विचार करने की जरूरत है.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 2, 2011

    सिंह जी,आपने लेख को गंभीरता पूर्वक ग्रहण किया और अपनी प्रतिक्रिया दी,इसके लिए मैं आपका आभार प्रकट करता हूँ,इस आन्दोलन से हमें जो भी सकारात्मक सहयोग मिला है,उसे संचित रखते हुए आगे बढ़ना ही है,लुभावने विश्राम-स्थलों को देखकर ठिठकने से हमारी प्रगति ही प्रभावित होगी.

दीपक पाण्डेय के द्वारा
September 1, 2011

राहुल जी, साढ़े हुए शब्दों में अच्छे सवाल किये हैं आपने. पर बाबा रामदेव जी ने कालेधन के मुद्दे को लेकर  आन्दोलन शुरू किया उसे आन्दोलन को हाई जैक कर के सिर्फ जन लोक पल पर केंद्रित कर दिया और साथ ही बाबा जी को जिस दूध की मक्खी की तरह निकल फेंका ये सब और कई सवाल है जो अनुत्तरित हैं. 

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 2, 2011

    दीपक जी,सर्वप्रथम आपको वक़्त निकालकर प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक धन्यवाद….सत्य परेशां हो सकता है,पराजित नहीं,हमें स्वामी रामदेव पर पूरा भरोसा है,पिछले पांच वर्षों से देश भर की यात्रा कर उन्होंने लोगों को जगाया है,उनके इस योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,जो करता है वो खुद फरेबी है,मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा.

Santosh Kumar के द्वारा
September 1, 2011

राहुल जी ,..सादर नमस्कार आपके विचारों से पूरी तरह से सहमत हूँ ,..टीम अन्ना और सिविल सोसाइटी पर तमाम सवाल हैं ,…इस आन्दोलन की बड़ी सफलता जनाक्रोश का सडकों पर उतरना है ,..लेकिन क्या इतने भर से हमें कोई समाधान मिल सकता है ? कभी समय मिले तो मेरे व्यंग्य पर नजर डालिए ,..शायद आप निराश नहीं होंगे ? http://santo1979.jagranjunction.com/

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    September 2, 2011

    संतोष जी,टिप्पणी के लिए धन्यवाद…मैं तो आपको पढता ही रहता हूँ,आपने सही कहा है,जब तक हमें उचित समाधान नही मिलता,जश्न इत्यादि मनाना शोभा नही देता.


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