जबां हिलाओ

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यह दीपक बुझने न देना

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हमारे देश का इतिहास अत्यंत ही समृद्ध रहा है….हमारी समृद्ध विरासत की चमक से विदेशी हमलावर भी कालांतर में इसकी और आकृष्ट हुए और लूट के सारे हथकंडे अपनाने के पश्चात हमारी संस्कृति को दूषित करने में भी भरसक अपना पूरा जोर लगा दिया,धन्य हैं हमारे पूर्वज जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी स्व-धर्म और समाज की रक्षा कर हमारी संस्कृति की मौलिकता को बचाए रखा,उन्होंने कुटिल कायर आक्रमणकारियों के सामने कभी भी समर्पण करना स्वीकार नहीं किया.
हमारे खजाने धन-धान्य से हमेशा भरे रहते थे,अधिकतर विदेशी हमारे देश को ‘सोने की चिड़िया’ ही कहा करते थे और धूर्तता के तमाम आयामों को आजमा कर जितना भी बन सके हमारे देश को लूटना भर चाहते थे,भरसक लूटा भी सही.. १९४७ में जब विदेशी सत्ता का खात्मा हुआ तो बड़ी उमीदे जगी थी,अब हम पूरी तरह आजाद थे…लेकिन खजाने की लूट बदस्तूर जारी ही रही.
जब मैं अपने देश के गौरवशाली इतिहास को देखता हूँ और आज की परिस्थितियों से उसकी तुलना करता हूँ तो मैं बहुत बड़ी दुविधा में घिर जाता हूँ,यह सवाल बार बार मेरे मष्तिष्क में गूंजता है कि क्या मेरा भारतीय होने पर गर्व करना लाजिमी है?
मान लीजिये किसी समृद्ध विरासत का उत्तराधिकारी अपने कर्तव्यों को भूल कर स्वार्थ में मगन हो जाए और अपनी विरासत को बेचकर खाने लगे और हमेशा कहे कि उसे उसकी विरासत पर बहुत गर्व है तो उसे आप क्या कहेंगे?क्या उसका गर्व करना उचित है?
हम देश की विरासतों को अपने सामने लुटते हुए देखते रहे,क्या हमें खुद का आकलन करने की आवश्यकता नहीं?


देश के सबसे बड़े चोरों का सम्बन्ध संसद या सांसद से जरूर होता है,क्या यह गर्व का विषय होना चाहिए?

आजादी के छः दशक बाद भी आधी से ज्यादा आबादी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है,क्या यह गर्व का विषय है?

हमारी सरकारें आम जनता पर आपातकाल लगवाती हैं,जनता के अधिकारों की बात करने वाले पर डंडे बरसाना,जबकि देश बांटने की बात करने वालों को संरक्षण देना क्या गर्व का विषय है?

कश्मीरी पंडितों का घर जला कर उन्हें कश्मीर से भागने पर मजबूर किया गया,हम और हमारी सरकार नपुंसक बने बैठे रहे,क्या यह गर्व का विषय है?

अपनी जमीन के लिए संघर्ष कर रहे किसानो को गोली मिलती है,देश पर हमला करने वाले को उच्चस्तरीय सुरक्षा और सुख-सुविधाएं,क्या यह गर्व का विषय है?

भूमिहीनों का दशकों का संघर्ष भी उन्हें जीने लायक जमीन नहीं दिला पाता है,जबकि राजनितिक रसूखदारों को पलक झपकते हजारों एकड़ जमीन का आवंटन कर दिया जाता है,क्या यह गर्व का विषय है?

आतंकवादियों से डरकर सरकार देश का राष्ट्रीय ध्वज न फहरने देने की चाक चौबंद व्यवस्था करवाती है,दूसरी तरफ सीमा पार से होने वाले घुसपैठ पर अंकुश नहीं लगा पाती,क्या यह गर्व का विषय है?

जो परम्पराएं(शिक्षा पद्धति,चिकित्सा पद्धति,जीवन दर्शन आदि) हमारे पूर्वज कई सहश्त्राब्दियों से बचाकर लाये थे,उनमे से अधिकतर को हमने पिछले सौ वर्षों में एक एक कर मिटटी में मिला दिया है,क्या यह गर्व का विषय है?

हमें इस देश पर गर्व करने का अधिकार तभी होना चाहिए जब खुद हमारी अंतरात्मा हमें ऐसा करने की स्वीकारोक्ति दे,हमें देश के लिए आगे आकर कुछ ऐसा करना होगा जिसका हमारे स्वार्थ से कोई सरोकार न हो,पारमार्थिक सेवा ही सच्ची सेवा होती है.अगर हम सबको भारतीय होने में गर्व की सच्ची अनुभूति करनी है तो आइये एक मौका है कि हम अपनी अकर्मणता को त्यागकर देश-हित में निकले लाखों जागरूक नागरिकों के साथ भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध लड़ाई में भागीदार बनें.यही मौका है,आइये हम खुद को अपने जीवन पर गर्व करने का एक उचित कारण दें…यह लड़ाई हम जरूर जीतेंगे,हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए यह वक़्त बहुत अहम् है.गौरवशाली भारत के पुनर्निर्माण के पथ पर बढ़ना ही होगा…कृपया आगे आइये,ताकि हमारा जमीर हमें धिक्कारे नहीं…और तब शायद हमारा,आपका यह कहना जरा जायज लगे कि ‘मुझे हिन्दुस्तानी होने पर गर्व है.’

“दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुन: अखंड बनाएँगे।
गिलगित से गारो पर्वत तक आज़ादी पर्व मनाएँगे।।

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें।
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें।।”
-श्री अटल बिहारी वाजपेयी



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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
August 15, 2011

राहुल जी आपकर प्रश्न यथार्थ के धरातल पर खरे हैं,परन्तु कचोटते हैं.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 16, 2011

    नमस्ते निशाजी,वस्तुतः ये सवाल हमेशा से कचोटते रहे हैं…यही वो कटु सत्य है,जिससे पार पाना हमारे स्वर्णिम भविष्य के लिए अनिवार्य रूप से जरुरी है.आपकी प्रतिक्रिया का साभार स्वागत है.

abodhbaalak के द्वारा
August 13, 2011

जब तक आप जैसे लोग हिं दीपक नहीं बुझेगा …. कभी नहीं

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक धन्यवाद,आपकी आशाओं पर खरा उतरने की पूरी चेष्टा करूँगा,इस टिमटिमाते दिए की लौ को बनाये रखने में आप लोगों की हौसला-आफजाई का बहुत बड़ा योगदान है,एवं उम्मीद है कि आगे भी आप जैसे चमकते सितारे हमारे साथी बने रहें. :)

Santosh Kumar के द्वारा
August 12, 2011

आदरणीय राहुल जी ,. बहुत सार्थक प्रश्न ,..क्या हम एतिहासिक महानता का ढिंढोरा ही पीटते रहेंगे ,..देश गंभीर संकट की तरफ तेजी से बढ़ रहा है ,… हमारी अस्मिता तार तार हो रही है ..

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    संतोष जी,प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक आभार,देर से ही सही,पर अभी अवसर है कि हम अपनी ताकत पहचाने वरना यह वक़्त हमेशा नही आता,जब सब जगे हों.हमारी इज्जत हमारे हाथों में है.

vasudev tripathi के द्वारा
August 11, 2011

राहुल भाई, निश्चित रूप से आपने सार्थक और विचारणीय बिंदु उठाये हैं जिनके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद| ये प्रश्न आज भारत का दुर्भाग्य भी हैं और राष्ट्रीय शर्म भी……., जिनके अनिवार्य उत्तर ही भारत का भविष्य हैं|

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    वासुदेव जी,लोकतंत्र तमाम दोषों से भरा हुआ है,लेकिन यह तो अलोकतंत्र है…आपने बिलकुल सही कहा है,प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद. :)

rahul के द्वारा
August 11, 2011

राहुल भैया आपके इस लेख ने हमे भि ये सोचने पर मजबुर कर दिया है कि कया हम भारतीये होने पे गरव कर सकते है।।। सायद ये इस आने वाले 15 को तो बिलकुल भि नही।

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    धन्यवाद बन्धु,इसीलिए तो कहता हूँ कि आगे बढ़ो,खुद जिम्मेदारी लो,अपने मित्रों को प्रेरित करो,यह हम सभी को करना होगा…यह देश हमारा है,हरामी नेताओं का नही,यह बात उन्हें समझाना अब निहायत जरुरी हो गया है.मेरे आलेख पर पहली बार टिप्पणी देने पर हार्दिक स्वागत.

पीयूष पंत के द्वारा
August 11, 2011

राहुल भाई…… कई सार्थक प्रश्न आपने यहाँ उठाए हैं….. ये वास्तव मे बड़ा खेद का विषय है की भारत की महानता केवल शब्दों मे ही रह गई है……. धरातल पर केवल भय, भूख, भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ ही है…… नेता और डाकू का फर्क समझ नहीं आता है…… जो सबसे सबसे अयोग्य होता है वो ही मंत्री बन जाता है……. अफसर अपनी मर्जी के नियमों को इन कम मूर्ख नेताओं से बनवा कर खुद ऐश कर लेते हैं….. ग्रामीण क्षेत्रों के लिए योजना दिल्ली के होटलों मे बनाई जाती हैं….. और फिर कहते हैं की देश तरक्की कर रहा है………..

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    इस बार सो गए तो फिर सवेरा कब हो तय नही है…’जिन्दा कौमें पांच साल इंतज़ार नही करतीं.’ आपके वक़्त निकाल कर इस लेख को पढ़ा,इसके लिए धन्यवाद पियूष जी :)

वाहिद काशीवासी के द्वारा
August 11, 2011

राहुल जी, आपका यह आलेख सचमुच में विचारणीय है। गर्व से कहो हम भारतीय हैं, ये जुमला लगता तो बहुत सुन्दर है पर इसके पीछे का सच आपने अपने लेख के माध्यम से दिखा दिया है। जब तक वर्तमान परिस्थितियां बनी रहेंगी तब तक तो चाह कर भी ये जुमला ज़ुबान से नहीं निकल सकता बल्कि खुदबखुद ये बात निकल जाएगी कि शर्म से कहता हूँ कि मैं भारतीय हूँ। हमारे जागने और कुछ करने का वक़्त है ये। लेख के अंत में परम श्रद्धेय एवं मेरे प्रेरणास्रोत माननीय अटल जी की रग-रग में जोश भरती पंक्तियों ने आपके आलेख के विषय को और स्पष्ट कर दिया है। साधूवाद आपको आँखें खोलने के लिए,

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    August 14, 2011

    आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद संदीप जी :)


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