जबां हिलाओ

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क्षुब्ध कविता

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लिख डालूँ एक नयी गाथा

वेद,पुराण,कुरान मिलाकर;

रामायण का अंश भी ले लूं

सब धर्मो का क्षोभ मिटा दूं.

महाकलह से त्राण दिला दूं

काल के गाल न असमय कोई;

जाये,उसको प्राण दिला दूं.

थके नहीं जो रुके कभी ना;

ऐसा कुछ वरदान दिला दूं.

भाग्यविधाता को झुठलाकर,

सबको अपना मान दिला दूं.

रची न जाये फिर महाभारत,

ऐसा कुछ संधान दिला दूं.

घुट-घुट मरते लोकतंत्र में

थोड़ी सी भी जान दिला दूं

कलम मुझे दे ऐसी शक्ति,

प्रजातंत्र से ‘वंशवाद’ का नाम मिटा दूं.

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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ayilia के द्वारा
July 4, 2011

Dis was nt wt i expected…

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    don’t expect things without having any idea about them :D

Vinita Shukla के द्वारा
July 4, 2011

अच्छी रचना है राहुल जी.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    पसंद करने के लिए धन्यवाद विनीता जी.

shaktisingh के द्वारा
July 4, 2011

आपने इस कविता से भारत के नस- नस को सामने लाकर राख दिया, बधाई हो,

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    शक्ति सिंह जी,आपके उत्साहवर्धक आकलन हेतु आपका धन्यवाद.

ashvinikumar के द्वारा
July 4, 2011

राहुल जी जय भारत ,,अति सुन्दर ज्वलंत काव्य अति सुन्दर मनोभाव ,,लेकिन इस वन्स्वाद की जड़ें किस्से जुडी हैं ,,यह विशाल वट वृक्छ जो भारत में किसी अच्छे पौधे को पनपने नही देता ,,इसकी साजिशों का शिकार शुभाष चन्द्र भगत सिंह और न जाने कितने वीर सपूत हुए ,,लेकिन इतिहाश को दफ़न कर दिया गया ,,,अन्यथा गयासुदीन गाजी ,,गंगाधर नही बन जाता ,वह अंगेज जिससे भारतीय अपनी स्वतंत्रता के लिए अनवरत संघर्ष कर रहे थे लेकिन एक वंश /व्यक्ति इतिहाश को दफ़न करने के लिए उन्ही अंग्रेजों के तलवे चाटता रहा उनसे पारितोषिक लेता रहा,,,और साथ ही जनता को भी भ्रमित करता रहा की वह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है,,सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है की यह वंश मुग़ल वंश है या केवल फ्रीजियन का वंश या फिर कुछ और जिसके लिए कोइ शब्द ही नही रचा गया ,,लेकिन जो भी है एक ऐसा विष है जिससे पूरा भारत वर्षों से पीड़ा झेलता रहा (आस्तीन का सांप ) लिखने को बहुत कुछ है परन्तु फिर कभी ……………………………जय भारत

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    आप सही कह रहे हैं अश्विनी जी,अब वक़्त आ गया है जब इस दीमक का नाश हो…समय निकालकर टिप्पणी देने के लिए आपका आभारी हूँ.

nishamittal के द्वारा
July 4, 2011

कमाल की पंक्तियाँ राहुल जी,आपके सभी मनोरथ पूर्ण हों.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    निशा जी,नमस्कार,हौसला बढाती हुयी टिप्पणी देने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

संदीप कौशिक के द्वारा
July 3, 2011

रची न जाये फिर महाभारत, ऐसा कुछ संधान दिला दूं. घुट-घुट मरते लोकतंत्र में थोड़ी सी भी जान दिला दूं कलम मुझे दे ऐसी शक्ति, प्रजातंत्र से ‘वंशवाद’ का नाम मिटा दूं. . . भगवान करे ये इच्छा-शक्ति हर भारतीय युवा की रगों में खून बनकर दौड़े ! वंदे मातरम !!

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    भगवान् आपकी इच्छा पूरी करे संदीप जी,कविता आपको अच्छी लगी,टिप्पणी देने लायक समझा,बहुत ख़ुशी हुयी,आपका धन्यवाद.

chaatak के द्वारा
July 3, 2011

राहुल जी, आप कलम की धार को यूँ ही बनाए रखिये ये वंशवाद अब अपने पतन की ओर जाने की ही बाट जोह रहा है| बस एक धक्का पूरी ताकत के साथ लगना चाहिए | वन्देमातरम !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    चातक जी,अपना कीमती वक़्त निकल कर अपनी टिप्पणी से हौसला बढ़ाने एवं हाथ मिलाने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
July 3, 2011

राहुल, आपकी लेखनी से जो अनल निकली है उसे यूँ ही प्रज्ज्वलित रखियेगा| आभार,

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार संदीप जी.

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 3, 2011

भाई साहिब अच्छी कविता है आपकी लेकिन एक गुजारिश भी है आपसे की अपने बेटे को लेखक या फिर ब्लागर मत बनने देना हा हा हा हा

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    :D नमस्कार राजकमल जी लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था के साथ साथ लोकतान्त्रिक लेखन व्यवस्था भी होनी चाहिए. जैसे ही लेखन में लोकतंत्र आ जायेगा……आपकी बात मनवाने की पूरी कोशिश करूँगा.

Alka Gupta के द्वारा
July 3, 2011

राहुल जी , आपकी इच्छा शक्ति को बल मिले शुभकामनाएं ! अति उत्तम रचना !

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    शुभकामनाओं हेतु धन्यवाद अलका जी.

पियूष पंत के द्वारा
July 3, 2011

कलम मुझे दे ऐसी शक्ति, प्रजातंत्र से ‘वंशवाद’ का नाम मिटा दूं. बहुत ही सुंदर रचना राहुल भाई……

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    July 5, 2011

    पियूष जी,यह लघु-काव्य आपको पसंद आया और आपने वक़्त निकलकर टिपण्णी की,इसके लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.


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